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राहु की महादशा (Rahu ki Mahadasha): 18 साल में क्या होता है, अच्छी या बुरी?
आखिरी अपडेट · Kundlit संपादकीय टीम
एक नज़र में
- अवधि
- 18 साल
- जन्म से शुरू, अगर चंद्र इस तारे में हो
- आर्द्रा, स्वाती या शतभिषा
- इससे पहले
- मंगल की दशा (7 साल)
- इसके बाद
- गुरु की दशा (16 साल)
- किन बातों से जुड़ी
- विदेश और बाहरी लोग, अचानक लाभ-हानि, पद, झगड़े
- राहु की उच्च राशि
- वृषभ (पाराशर 47.35)
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शास्त्रों के अनुसार राहु की महादशा में क्या होता है?
शास्त्र राहु की दशा के दो रूप बताते हैं। राहु मजबूत हो तो पाराशर धन-धान्य, वाहन और नया घर गिनाते हैं। साथ में पुत्र का जन्म, उत्सव और विदेशी राजाओं से सम्मान (पाराशर 47.36-38)। फलदीपिका शुभ ग्रहों के साथ अच्छे घर में बैठे राहु की बात करती है। वह राजा जैसा वैभव, टिकी हुई बचत और यश देता है (19.15)।
राहु कमजोर हो तो यही ग्रंथ साफ कहते हैं। फलदीपिका राजा और चोर का डर, बदनामी, और पद व जगह छूटना बताती है (19.14)। जातक पारिजात घर से दूर रहना और झगड़े की ओर झुकता मन जोड़ता है (18.95)। 18 साल कैसे गिने जाते हैं, यह मुख्य महादशा पेज पर समझाया गया है।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 47, श्लोक 34–43 (महर्षि संस्करण); फलदीपिका, मंत्रेश्वर, अध्याय 19, श्लोक 14-16, 21 (राहु की दशा); जातक पारिजात, वैद्यनाथ, अध्याय 18, श्लोक 95-108 (राहु की दशा)
महादशा की तारीखें कैसे निकलती हैंराहु की महादशा कब अच्छी होती है और कब कठिन?
घर लग्न से गिनें, सूर्य राशि से नहीं। पाराशर के अनुसार तीसरे या ग्यारहवें घर का राहु राजकृपा और हर सुख देता है। केंद्र (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण (1, 5, 9) में भी यही फल है। शर्त यह है कि उसके साथ या उस पर शुभ ग्रहों की नजर हो। या वह शुभ राशि में हो (47.38-39)। आठवें या बारहवें घर में राहु कष्ट देता है। पापी ग्रहों से जुड़ा या नीच राशि का राहु पद छुड़ाता है। वह मन को दुख भी देता है (47.40-41)।
राशि भी मायने रखती है। राहु वृषभ में उच्च का है। मिथुन और कुंभ भी उसकी मजबूत राशियाँ हैं (47.35-36)। जातक पारिजात और ज्योतिष रत्नाकर मेष, वृषभ या कर्क के राहु को शुभ मानते हैं। वह धन, विद्या और सम्मान देता है (जा.पा. 18.105; ज्यो.र. 328)। कन्या, धनु या मीन का राहु पद और सुख देता है। पर दशा के अंत में सब हाथ से निकल जाता है (जा.पा. 18.106)। फलदीपिका यही बात कन्या, वृश्चिक और मीन के लिए कहती है (19.16)।
राहु जिस घर में बैठा है, उसी का फल देता है। जिस घर के स्वामी के साथ है, उसका फल भी देता है। केंद्र में बैठकर त्रिकोण के स्वामी से जुड़ा राहु योगकारक बन जाता है। त्रिकोण में बैठकर केंद्र के स्वामी से जुड़ा राहु भी। योगकारक यानी सफलता देने वाला ग्रह (पाराशर 34.16-17)।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 47, श्लोक 34–43 (महर्षि संस्करण); जातक पारिजात, वैद्यनाथ, अध्याय 18, श्लोक 95-108 (राहु की दशा); ज्योतिष रत्नाकर, अनुच्छेद 328, पृष्ठ 797-800 (राशि और घर के हिसाब से राहु की दशा); फलदीपिका, मंत्रेश्वर, अध्याय 19, श्लोक 14-16, 21 (राहु की दशा); बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34, श्लोक 16-17 (महर्षि संस्करण)
हर घर में राहु की महादशा का फल
ज्योतिष रत्नाकर हर घर के राहु का अलग फल देता है (अनुच्छेद 328)। तीसरा और ग्यारहवाँ घर साफ तौर पर सबसे अच्छे हैं। दसवाँ घर शुभ राशि में अच्छा और पापी राशि में कठिन है। बाकी घर कठिनाई की ओर झुकते हैं। इसलिए पाराशर की तरह देखें कि राहु के साथ शुभ ग्रह हैं या नहीं।
| घर | राहु की दशा क्या देती है (ज्योतिष रत्नाकर) |
|---|---|
| पहला | बुद्धि में उलझन, हार, आग और हथियार का डर |
| दूसरा | धन और इज्जत में कमी, सरकारी परेशानी, चिंतित मन |
| तीसरा | परिवार और भाई-बहनों से सुख, राजा से सम्मान, विदेश आना-जाना |
| चौथा | जमीन और धन की हानि, परिवार की चिंता, वाहन से गिरना |
| पाँचवाँ | मन में भ्रम, मुकदमे, संतान की चिंता |
| छठा | सरकार, आग और चोर का डर; मित्रों से दूरी; सेहत कमजोर |
| सातवाँ | शादी में तनाव, विदेश यात्रा, धन और खेती में नुकसान |
| आठवाँ | पत्नी-बच्चों को कष्ट, चोरी का डर, अपने ही लोगों से हानि |
| नौवाँ | पिता और गुरु के लिए कठिन, विदेश यात्रा, धन की हानि |
| दसवाँ | शुभ राशि में धर्मग्रंथ पढ़ना और तीर्थ-स्नान; पापी राशि में दुख और परदेस |
| ग्यारहवाँ | सम्मान, धन, घर, जमीन और कई तरह के सुख |
| बारहवाँ | जगह-जगह भटकना, पैसों की चिंता, परिवार से दूरी |
आधार: ज्योतिष रत्नाकर, अनुच्छेद 328, पृष्ठ 797-800 (राशि और घर के हिसाब से राहु की दशा); बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 47, श्लोक 34–43 (महर्षि संस्करण)
राहु की महादशा की शुरुआत, बीच और अंत में क्या होता है?
तीन ग्रंथ इस पर एक मत हैं। पाराशर कहते हैं कि शुरू में शरीर को कष्ट और धन की हानि होती है। बीच में सुख और अपने ही देश में लाभ होता है। अंत में कष्ट, पद छूटना और मन का दुख (47.42-43)। जातक पारिजात भी यही कहता है। पहले दुख, बीच में बड़ा सुख, अंत में पद से गिरना (18.108)। ज्योतिष रत्नाकर यही दोहराता है (अनुच्छेद 328)।
लोग अक्सर राहु की महादशा के आखिरी 6 साल के बारे में पूछते हैं। ये शुक्र, सूर्य, चंद्र और मंगल की अंतर्दशाएँ हैं। कुल मिलाकर ये करीब 6 साल 5 महीने हैं। दशा के अंत की चेतावनी इन्हीं सालों पर पड़ती है। ये कितने कठिन होंगे, यह इन चार ग्रहों की जगह से तय होता है।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 47, श्लोक 34–43 (महर्षि संस्करण); जातक पारिजात, वैद्यनाथ, अध्याय 18, श्लोक 95-108 (राहु की दशा); ज्योतिष रत्नाकर, अनुच्छेद 328, पृष्ठ 797-800 (राशि और घर के हिसाब से राहु की दशा)
राहु की महादशा में कौन सी अंतर्दशा सबसे खराब है?
अंतर्दशा बड़ी दशा के अंदर का छोटा दौर है। फलदीपिका पाँच अंतर्दशाओं पर सख्त है। राहु-शनि, राहु-केतु, राहु-सूर्य, राहु-चंद्र और राहु-मंगल झगड़े, डर और नुकसान देती हैं (21.32-38)। पाराशर राहु-केतु को भटकने और सरकारी डर से शुरू करते हैं (55.40)। राहु-गुरु और राहु-बुध हर ग्रंथ में सबसे अच्छी हैं। (पाराशर 55.8-12, 55.30-33; फलदीपिका 21.31, 21.33)
फिर भी पाराशर हर अंतर्दशा को ग्रह की जगह से जोड़ते हैं। नीचे की तालिका में हर अंतर्दशा का अच्छा और कठिन फल दिया है। अंतर्दशाएँ उसी क्रम में हैं जिसमें वे आती हैं।
| अंतर्दशा | अवधि | अच्छी स्थिति में | कठिन स्थिति में |
|---|---|---|---|
| राहु-राहु | 2 साल 8 महीने 12 दिन | कर्क, वृश्चिक, कन्या या धनु में: सम्मान, वाहन, कारोबार में मुनाफा (55.1-4) | आठवें या बारहवें घर में पापी ग्रहों के साथ: चोरी, चोट, काम की जगह पर दुश्मनी (55.5-6) |
| राहु-गुरु | 2 साल 4 महीने 24 दिन | ऊँचा पद, हिम्मत, शत्रु पर जीत, लगातार बढ़त (55.8-12) | कमजोर या 6/8/12 में: धन की हानि, काम में रुकावट, मान की हानि (55.13-14) |
| राहु-शनि | 2 साल 10 महीने 6 दिन | बड़े लोगों की सेवा, शादियाँ, बाग और तालाब बनवाना (55.21-23) | कमजोर या 8/12 में: सत्ता का डर, परिवार में तनाव, कारोबार में झगड़े (55.25-26) |
| राहु-बुध | 2 साल 6 महीने 18 दिन | सफलता, व्यापार से कमाई, विद्या, शादी के उत्सव (55.30-33) | 6/8/12 में: अचानक झगड़ा, धन की हानि, बड़े लोगों का गुस्सा (55.36-38) |
| राहु-केतु | 1 साल 0 महीने 18 दिन | शुभ ग्रहों के साथ: सुख, कमाई, सम्मान (55.41) | भटकना, सरकारी डर, बुखार; आठवें घर में और कठिन (55.40-41) |
| राहु-शुक्र | 3 साल | विद्वानों से लाभ, सम्मान, नया घर, शादी (55.46-51) | 6/8/12 में या कमजोर: बीमारी, अचानक झगड़े, बिछड़ना (55.51-53) |
| राहु-सूर्य | 10 महीने 24 दिन | राजकृपा, धन, छोटा अधिकार (55.60-62) | 6/8/12 में या कमजोर: बुखार, सत्ता से टकराव, शत्रु बढ़ना (55.64-65) |
| राहु-चंद्र | 1 साल 6 महीने | पद, धन, सेहत, परिवार का सुख; पूरा चंद्र पूरा फल देता है (55.68-70) | 6/8/12 में या कमजोर: घर या जमीन का नुकसान, रास्ते में खतरा (55.73-74) |
| राहु-मंगल | 1 साल 0 महीने 18 दिन | खोया पद और धन वापस, घर और जमीन में बढ़त (55.76-77) | 6/8/12 में पापी ग्रहों के साथ: परिवार में विरोध, पद छूटना (55.80-81) |
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 55, उपाय का श्लोक 19 सहित (महर्षि संस्करण); फलदीपिका, अध्याय 21 (अंतर्दशा फल; जीवन की स्थिति वाला श्लोक 84); जातक पारिजात, वैद्यनाथ, अध्याय 18, श्लोक 95-108 (राहु की दशा)
राहु की महादशा के उपाय शास्त्रों में क्या हैं?
पाराशर हर उपाय को किसी कठिन अंतर्दशा से जोड़ते हैं (अध्याय 55)। राहु-राहु में विधि से शांति कराने को कहा है (श्लोक 7)। राहु-गुरु में शिव पूजा और सोने की प्रतिमा का दान है (श्लोक 19)। राहु-बुध में विष्णु सहस्रनाम का पाठ है (श्लोक 39)।
राहु-शुक्र में पाराशर दुर्गा और लक्ष्मी का जप बताते हैं (श्लोक 59)। यानी राहु की दशा में दुर्गा पूजा की जड़ शास्त्र में है। राहु-सूर्य में सूर्य को प्रणाम कहा है (श्लोक 67)। अच्छे राहु-चंद्र में देवी की आराधना बताई है (श्लोक 72)। कुछ श्लोकों में पशु दान भी है, उसे हमने यहाँ छोड़ दिया है।
ज्योतिष रत्नाकर कठिन राहु दशा के लिए सोने के पात्र का दान बताता है। राहु के दान में गोमेद, नीला कपड़ा, कंबल, तिल, तेल और लोहा है। साथ में राहु के मंत्र का जप 18,000 बार (पृष्ठ 913-917)।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 55, उपाय का श्लोक 19 सहित (महर्षि संस्करण); ज्योतिष रत्नाकर, शांति प्रकरण, पृष्ठ 913-919
क्या सभी ग्रंथ राहु पर एक मत हैं?
समय के बारे में हाँ: तीनों ग्रंथ शुरुआत और अंत को कठिन बताते हैं। घरों के बारे में पूरी तरह नहीं। पाराशर केंद्र को तब अच्छा मानते हैं जब राहु के साथ शुभ ग्रह हों। ज्योतिष रत्नाकर चौथे और सातवें घर के राहु को बिना शर्त कठिन कहता है। पाराशर राहु का मूलत्रिकोण मिथुन में रखते हैं। मूलत्रिकोण यानी उच्च के बाद सबसे मजबूत राशि। ज्योतिष रत्नाकर इसे कर्क में रखता है।
सारावली राहु की दशा का कोई फल नहीं देती। उसके दशा वाले अध्याय सिर्फ सात दिखने वाले ग्रहों के हैं (अध्याय 40-41)। यह पेज पाराशर को आधार मानता है। साथ में बताता है कि बाकी ग्रंथ कहाँ कुछ जोड़ते हैं या अलग कहते हैं।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 47, श्लोक 34–43 (महर्षि संस्करण); ज्योतिष रत्नाकर, अनुच्छेद 328, पृष्ठ 797-800 (राशि और घर के हिसाब से राहु की दशा); सारावली, कल्याणवर्मा, अध्याय 40-41 (दशा के अध्याय; केवल सात ग्रह)
राहु की महादशा में हर अंतर्दशा कितनी लंबी होती है?
पूरे 18 साल के दौर में नौ छोटे दौर आते हैं। पहला राहु का अपना होता है। हर लंबाई का हिसाब: बड़े दौर के साल × छोटे दौर के साल ÷ 120। आपकी तारीखें दशा कैलकुलेटर देता है।
| छोटा दौर | लंबाई | गणना |
|---|---|---|
| राहु | 2 साल 8.4 महीने | 18 × 18 ÷ 120 |
| गुरु | 2 साल 4.8 महीने | 18 × 16 ÷ 120 |
| शनि | 2 साल 10.2 महीने | 18 × 19 ÷ 120 |
| बुध | 2 साल 6.6 महीने | 18 × 17 ÷ 120 |
| केतु | 1 साल 0.6 महीने | 18 × 7 ÷ 120 |
| शुक्र | 3 साल | 18 × 20 ÷ 120 |
| सूर्य | 10.8 महीने | 18 × 6 ÷ 120 |
| चंद्र | 1 साल 6 महीने | 18 × 10 ÷ 120 |
| मंगल | 1 साल 0.6 महीने | 18 × 7 ÷ 120 |
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46, श्लोक 3, 12–16 (महर्षि संस्करण); बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 51, श्लोक 1–3 (महर्षि संस्करण)
मिसाल की कुंडली — किसी असली व्यक्ति की नहीं
जन्म पर बचा समय कैसे निकालें?
चंद्रमा को 193°20′ पर मानें। स्वाती 186°40′ से 200°00′ तक है। चंद्रमा इस तारे में 6°40′ चल चुका है। पूरे 13°20′ का आधा हिस्सा बचा है। जन्म पर राहु का समय 18 × 0.5 = 9 साल है। इसके बाद गुरु के पूरे 16 साल आते हैं। यह चंद्रमा की जगह से समझाई मिसाल है, किसी व्यक्ति का फलादेश नहीं।
ये शास्त्र के नियम हैं; इनमें से कौन सा आप पर लागू होगा, यह आपकी कुंडली और जन्म के सही समय से तय होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या राहु की महादशा के पूरे 18 साल बुरे होते हैं?
नहीं। तीसरे, ग्यारहवें, या शुभ ग्रहों के साथ केंद्र-त्रिकोण में बैठा राहु शुभ है। वह धन, नया घर और विदेश से सम्मान देता है (पाराशर 47.36-39)। पाराशर और जातक पारिजात दोनों बीच के सालों को सबसे अच्छा बताते हैं (47.43; 18.108)।
राहु की महादशा कितने साल की होती है?
पूरी दशा 18 साल की है। जन्म से यह तभी शुरू होती है जब चंद्र आर्द्रा, स्वाती या शतभिषा में हो। तब सिर्फ बचा हुआ हिस्सा मिलता है (पाराशर अध्याय 46)। पहली अंतर्दशा राहु-राहु 2 साल 8 महीने 12 दिन की है। आखिरी अंतर्दशा राहु-मंगल है।
राहु की महादशा के आखिरी 6 साल कैसे होते हैं?
इनमें शुक्र, सूर्य, चंद्र और मंगल की अंतर्दशाएँ आती हैं। राहु दशा का अंत कष्ट, पद छूटना और मन का दुख लाता है (पाराशर 47.43)। फलदीपिका राहु-सूर्य, राहु-चंद्र और राहु-मंगल पर सख्त है (21.36-38)। राहु-शुक्र को वह मिला-जुला बताती है (21.35)।
क्या राहु की महादशा में शादी हो सकती है?
हाँ। पाराशर अच्छी स्थिति वाली राहु-शनि (55.22) में शादी और उत्सव बताते हैं। राहु-बुध (55.32, 55.35) और राहु-शुक्र (55.51) में भी। इसके लिए अंतर्दशा वाला ग्रह आपकी कुंडली में अच्छी जगह होना चाहिए।
क्या राहु की महादशा में विदेश यात्रा होती है?
अक्सर होती है। पाराशर मजबूत राहु की दशा में विदेशी राजाओं से सम्मान बताते हैं (47.38, 47.40)। जातक पारिजात परदेस में रहना बताता है (18.95)। ज्योतिष रत्नाकर तीसरे, सातवें या नौवें घर के राहु में विदेश यात्रा बताता है। बारहवें में वह भटकना बताता है (अनुच्छेद 328)।
राहु की महादशा के बाद कौन सी दशा आती है?
इसके बाद गुरु की 16 साल की दशा आती है। यह गुरु-गुरु अंतर्दशा से शुरू होती है। अपनी कुंडली में बदलाव की सही तारीख ऊपर दिए कैलकुलेटर में देखें।
स्रोत
पाराशर के अध्याय महर्षि संस्करण के अनुसार हैं। दूसरे संस्करणों में नंबर बदल सकते हैं।
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46, श्लोक 3, 12–16 (महर्षि संस्करण)
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 47, श्लोक 34–43 (महर्षि संस्करण)
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 55, उपाय का श्लोक 19 सहित (महर्षि संस्करण)
- फलदीपिका, अध्याय 21 (अंतर्दशा फल; जीवन की स्थिति वाला श्लोक 84)
- फलदीपिका, मंत्रेश्वर, अध्याय 19, श्लोक 14-16, 21 (राहु की दशा)
- जातक पारिजात, वैद्यनाथ, अध्याय 18, श्लोक 95-108 (राहु की दशा)
- ज्योतिष रत्नाकर, अनुच्छेद 328, पृष्ठ 797-800 (राशि और घर के हिसाब से राहु की दशा)
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34, श्लोक 16-17 (महर्षि संस्करण)
- ज्योतिष रत्नाकर, शांति प्रकरण, पृष्ठ 913-919
- सारावली, कल्याणवर्मा, अध्याय 40-41 (दशा के अध्याय; केवल सात ग्रह)
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 51, श्लोक 1–3 (महर्षि संस्करण)
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा दुश्चिक्ये शुभराशिगे । महाराजप्रसादेन सर्वसम्पत्सुखावहम् ॥