ग्रहों के दौर समझें
महादशा क्या है? विंशोत्तरी दशा के 9 ग्रह, उनके साल, और मेरी महादशा कौन सी चल रही है (Mahadasha kya hai)?
आखिरी अपडेट · Kundlit संपादकीय टीम
एक नज़र में
- पूरा चक्र
- नौ ग्रह, 120 साल
- पहला ग्रह
- जन्म के चंद्र के तारे से
- सबसे छोटा / लंबा
- सूर्य 6 साल / शुक्र 20 साल
- साल का हिसाब
- दशा का एक साल = 365.25 दिन
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गणना के लिए खाता नहीं चाहिए। जन्म की तारीख, सही समय और जगह भरें।
महादशा का आसान मतलब क्या है?
महादशा समय को ग्रहों के लंबे दौरों में बाँटती है। दशा यानी समय-दौर। महा यानी बड़ा। यह बताती है कि अभी किस ग्रह का बड़ा दौर चल रहा है। जन्म की कुंडली ग्रह की जगह देती है। समय-क्रम बताता है कि उस ग्रह का दौर कब शुरू और खत्म होता है। दोनों बातें मिलाकर फल पढ़ा जाता है।
इसे नौ बराबर खानों वाली घड़ी न समझें। हर ग्रह की तय लंबाई अलग है। सूर्य को छह साल मिलते हैं। शुक्र को बीस। राहु को अठारह और शनि को उन्नीस। एक छोटा दौर और लंबा दौर अपने नाम से अच्छे या बुरे नहीं होते। फल ग्रह की जगह और बल से जुड़ा है।
पाराशर अध्याय 46 विंशोत्तरी को इस युग की मुख्य दशा कहते हैं। इस पेज पर उसी पद्धति का हिसाब है। दूसरे दशा-सिस्टम की तारीखें इसमें न मिलाएँ। ग्रह का बड़ा दौर और आज आकाश में उसका चलना भी अलग चीजें हैं। जन्म से बना समय-क्रम रोज नई शुरुआत नहीं करता।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46, श्लोक 3, 12–16 (महर्षि संस्करण)
नौ महादशाओं का क्रम और हर ग्रह के साल कितने हैं?
क्रम केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध है। बुध के बाद चक्र फिर केतु से चलता है। जन्म इनमें से किसी भी ग्रह में हो सकता है। इसलिए किसी कुंडली की पहली दिखाई पंक्ति केतु होना जरूरी नहीं। पहले ग्रह का बचा समय आएगा। उसके बाद अगला ग्रह पूरे समय से चलेगा।
पाराशर का श्लोक 12 कृत्तिका से गिनता है। वहाँ क्रम सूर्य से शुरू दिखता है। यह अलग चक्र नहीं है। उसी गोल क्रम का अलग शुरू-बिंदु है। कुल 120 साल का वजन गणना के लिए है। इसे आपकी उम्र या जीवन की तय लंबाई न समझें।
| ग्रह | साल | जन्म के तारे |
|---|---|---|
| केतु | 7 | अश्विनी, मघा, मूल |
| शुक्र | 20 | भरणी, पूर्व फाल्गुनी, पूर्व आषाढ़ |
| सूर्य | 6 | कृत्तिका, उत्तर फाल्गुनी, उत्तर आषाढ़ |
| चंद्र | 10 | रोहिणी, हस्त, श्रवण |
| मंगल | 7 | मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा |
| राहु | 18 | आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा |
| गुरु | 16 | पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व भाद्रपद |
| शनि | 19 | पुष्य, अनुराधा, उत्तर भाद्रपद |
| बुध | 17 | आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती |
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46, श्लोक 3, 12–16 (महर्षि संस्करण)
जन्म की तारीख से पहला महादशा-ग्रह कैसे मिलता है?
पहले जन्म के पल चंद्र की जगह तारों के हिसाब से निकालें। तारों वाले इस राशि-चक्र को निरयण कहते हैं। हम लाहिड़ी अयनांश लेते हैं, जो भारत में मानक है। फिर कैलकुलेटर चंद्र को 27 नक्षत्रों में से एक में रखता है।
हर तारा 13°20′ लंबा है। चंद्र जिस तारे में है, उस तारे का ग्रह पहला दौर तय करता है। नौ ग्रहों का क्रम तीन बार दोहराकर 27 तारों को ग्रह मिलते हैं। इसी कारण राहु के तीन जन्म-तारे हैं: आर्द्रा, स्वाती और शतभिषा। इस नियम में आपका सूर्य चिह्न पहला ग्रह तय नहीं करता। पाराशर 46.13 एक आसान जाँच देते हैं। कृत्तिका से अपने जन्म-नक्षत्र तक गिनें और नौ से भाग दें। शेष 1 हो तो सूर्य, 2 हो तो चंद्र, और इसी क्रम में आगे। शेष 0 हो तो शुक्र।
जन्म की जगह सही चुनें। कैलकुलेटर उसी से आपकी घड़ी का समय सही समय-क्षेत्र में पढ़ता है। जगह गलत हो तो सही समय पर भी नतीजा खिसक सकता है। नाम, लिंग या अभी की उम्र से पहला ग्रह तय नहीं होता।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46, श्लोक 3, 12–16 (महर्षि संस्करण); ज्योतिष रत्नाकर, पृष्ठ 125 (जन्म की दशा)
हमारी गणना की पद्धति पढ़ेंजन्म पर बचा दशा-समय कैसे निकालते हैं?
जन्म पर बचे समय को दशा-शेष कहते हैं। पहले तारे में चंद्र का चला हिस्सा निकालें। उसे पूरे 13°20′ से भाग दें। यह निकल चुका हिस्सा है। इसे एक से घटाएँ। अब बचे हिस्से को उस ग्रह के पूरे साल से गुणा करें। पाराशर श्लोक 46.16 और फलदीपिका 19.3 यही जन्म-शेष का आधार हैं।
मिसाल में चंद्र वृषभ के 18° पर है। पूरे चक्र में यह 48° है। रोहिणी 40° से 53°20′ तक है। चंद्र ने 8° पार किए हैं। 8 ÷ 13⅓ = 0.6 हिस्सा निकल चुका है। 0.4 बचता है। रोहिणी का ग्रह चंद्र है। चंद्र के दस साल × 0.4 = चार साल बचते हैं।
इस कुंडली में चार साल बाद मंगल शुरू होगा। उसके सात साल बाद राहु आएगा। राहु के अठारह साल बाद गुरु। उदाहरण में उम्रें चार, ग्यारह और उनतीस हैं। ये उदाहरण का हिसाब हैं, सभी के बदलाव की उम्रें नहीं। अपनी उम्र-सूची जन्म के चंद्र से निकालें।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46, श्लोक 3, 12–16 (महर्षि संस्करण); फलदीपिका, मंत्रेश्वर, अध्याय 19 (जन्म पर बची दशा का श्लोक 3 सहित)
मेरी महादशा कौन सी चल रही है, कैसे देखें?
ऊपर के फ्री टूल में जन्म तारीख, दर्ज समय और जगह डालें। शहर सूची से चुनें। अब गणना करें। अभी का बड़ा ग्रह, छोटा ग्रह और उसके अंदर का छोटा दौर दिखेंगे। खत्म होने की तारीखें साथ हैं। जन्म पर कौन सा समय बचा था, यह अलग खंड में है।
समय-क्रम में अभी की पंक्ति अलग दिखती है। उसकी शुरुआत और अंत देखें। फिर अगली पंक्ति पढ़ें। सिर्फ ग्रह का नाम नोट करने के बजाय तारीखें भी लिखें। दूसरे टूल में लाहिड़ी अयनांश और जन्म समय मिलाएँ। साल का हिसाब भी समान रखें। गलत तुलना से असली गलती दिखना मुश्किल होता है।
क्या कोई महादशा अपने आप अच्छी या बुरी होती है?
नहीं। पाराशर अध्याय 47, श्लोक 5 मजबूत जगह को अच्छे फल से जोड़ता है। अपनी, उच्च या मित्र राशि उस नियम में आती है। कमजोर जगह अलग फैसला देती है। इसलिए सभी के लिए सबसे अच्छी या सबसे बुरी महादशा की एक सूची नहीं है।
सारावली अध्याय 40, श्लोक 19 छोटे राशि-विभाग में कठिन जगह से मिले-जुले फल बताता है। यानी एक अच्छे बड़े नाम के अंदर भी फर्क है। कोई एक घटना पूरे दौर का प्रमाण नहीं। सही ग्रह, सही तारीख और सही जगह का मेल देखें। ग्रहों के पेज इसी वजह से अच्छे और कठिन हालात अलग रखते हैं।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 47, श्लोक 5 (महर्षि संस्करण); सारावली, कल्याणवर्मा, अध्याय 40 (श्लोक 19, 45–47 सहित)
अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा क्या हैं?
अंतर्दशा बड़े दौर के अंदर छोटा दौर है। हर बड़े दौर में नौ छोटे दौर हैं। पहला उसी ग्रह का है। प्रत्यंतर दशा उस छोटे दौर के भीतर और छोटा दौर है। यही अनुपात फिर लगता है। लंबाई का हिसाब: बड़े साल × छोटे साल ÷ 120।
राहु के अंदर शनि की लंबाई 18 × 19 ÷ 120 = 2.85 साल है। यानी करीब 2 साल, 10 महीने और 6 दिन। इसका मतलब राहु खत्म होकर शनि की महादशा शुरू होना नहीं है। मुख्य ग्रह अभी राहु ही है। एक ही ग्रह-जोड़ी को बड़े और छोटे स्तर पर उल्टा पढ़ना गलती होगी।
आधार: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 51, श्लोक 1–3 (महर्षि संस्करण)
सभी छोटे दौरों की तालिका देखेंशादी के दौर का नियम समझेंजन्म के सही समय से कितना फर्क पड़ता है?
चंद्र करीब 13° रोज चलता है। यह औसत है, रोज की तय गति नहीं। गलत समय चंद्र को तारे में आगे या पीछे रखता है। इससे जन्म का बचा समय बदलता है। तारे की सीमा के बहुत पास पहला ग्रह भी बदल सकता है। केवल समय गोल होने से निकला छोटा फर्क पूरे फल का फैसला नहीं है।
अस्पताल का दर्ज समय हो तो वही लिखें। परिवार का याद किया समय हो तो उसे ऐसा ही पहचानें। दो अनुमानित समय हों तो दोनों से गणना करके फर्क देखें। जो हिस्सा स्थिर है, उसे अलग लिखें। जो बदलता है, उसके लिए दर्ज समय ढूँढें। समय को सिर्फ पसंद का नतीजा पाने के लिए न बदलें।
मिसाल की कुंडली — किसी असली व्यक्ति की नहीं
रोहिणी की मिसाल: दस में से चार साल क्यों बचे?
मिसाल की कुंडली में चंद्र 48° पर है। तारे की शुरुआत 40° है। अंतर 8° है। पूरे 13°20′ में 60 प्रतिशत निकल चुके हैं। बाकी 40 प्रतिशत से चंद्र के चार साल मिलते हैं। नीचे अगली उम्रें देखें। यह उम्र का उदाहरण है, किसी असली व्यक्ति की जन्म-कुंडली नहीं।
कैलकुलेटर में आजमाने के लिए दिल्ली, 18 जनवरी 2000, सुबह 4:18 डालें। चंद्र लगभग ठीक 48° पर आता है। चंद्र के दौर के करीब चार साल बचते हैं। यह दौर भारतीय समय से 19 जनवरी 2004 को खत्म होता है।
एक दूसरा हिसाब करके नतीजा जाँचें। 13°20′ कुल 800 कोण-मिनट हैं। रोहिणी में निकले 8° कुल 480 मिनट हैं। बचे 320 मिनट ÷ 800 = 0.4। दस साल से गुणा करने पर फिर चार साल मिलते हैं। दशमलव डिग्री और कोण-मिनट दोनों तरीके सही हैं। बस 20 मिनट को 0.20 डिग्री न लिखें। एक डिग्री में 60 मिनट होते हैं।
जन्म के पहले निकला समय भी उपयोगी है। चंद्र के दस में से छह साल पहले निकल चुके हैं। पूरा चंद्र-दौर जन्म से छह दशा-साल पहले शुरू हुआ माना जाएगा। कैलकुलेटर इसी पूरे दौर को अंतर्दशाओं में बाँटता है। फिर जन्म को रखने वाला छोटा दौर खोजता है। केवल बचे चार साल को नौ हिस्सों में बाँटना सही नियम नहीं।
गलती ढूँढने की सूची रखें। पहला ग्रह सही है या नहीं देखें। फिर तारे की शुरुआत और अंत जाँचें। इसके बाद चंद्र का चला हिस्सा और बचा हिस्सा अलग लिखें। दोनों का योग एक होना चाहिए। ग्रह के पूरे साल से सिर्फ बचे हिस्से को गुणा करें। अगला पूरा ग्रह तय क्रम में रखें। इससे गलती की जगह मिलेगी। गलत ग्रह चुना था या गलत बाकी समय निकला था?
उदाहरण की उम्रों और तारीखों में एक और फर्क है। हमारा कैलकुलेटर चार दशा-साल को 1461 दिन गिनता है। यह जन्म से जोड़े जाते हैं। कैलेंडर में लीप साल और स्थानीय समय का हिसाब भी है। इसलिए शब्दों में चार साल बताना और सही घड़ी की अंत-तारीख देना अलग काम हैं। तालिका उम्र समझाती है। टूल दिन और समय दिखाता है। दोनों के बीच की इकाई पहचानें।
स्रोत पढ़ते समय संस्करण का नाम रखें। पाराशर के अध्याय यहाँ महर्षि संस्करण से हैं। दूसरी छपी किताब में उसी अध्याय का नंबर बदल सकता है। इससे अपने आप नियम बदलता नहीं। पाठ के शब्द और विषय भी मिलाएँ। केवल अलग अध्याय संख्या देखकर विरोध न मानें। यहाँ दी देवनागरी पंक्ति सालों का नियम है। इसे किसी व्यक्ति के भविष्य के फल में न बदलें।
| ग्रह | शुरू की उम्र | अंत की उम्र |
|---|---|---|
| चंद्र | 0 | 4 |
| मंगल | 4 | 11 |
| राहु | 11 | 29 |
| गुरु | 29 | 45 |
समय का भरोसा जन्म की जानकारी पर टिका है। ग्रह का दौर पक्का व्यक्तिगत नतीजा नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मेरी महादशा कौन सी चल रही है?
ऊपर के टूल में जन्म तारीख, दर्ज समय और जगह भरें। अभी का बड़ा दौर और खत्म होने की तारीख दिखेगी।
महादशा का क्रम क्या है?
केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध। फिर यही चक्र दोहराता है। जन्म किसी भी ग्रह के दौर में हो सकता है।
सबसे अच्छी या बुरी महादशा कौन सी है?
सभी के लिए एक नाम नहीं है। पाराशर ग्रह के बल और जगह से अच्छे-कठिन फल अलग करते हैं।
क्या पहला दौर पूरा चलता है?
जन्म पर चंद्र के तारे में जितना हिस्सा बचा है, उतना समय चलता है। इसलिए पहला दौर पूरा या छोटा हो सकता है।
क्या केवल जन्म तारीख काफी है?
सही समय और जगह भी चाहिए। गलत समय चंद्र की जगह और बचे समय को बदलता है।
क्या टूल इस्तेमाल करने के लिए खाता चाहिए?
नहीं। इस पेज का फ्री कैलकुलेटर बिना खाते के चलता है। AI चैट अलग सेवा है और उसका खाता नियम अलग है।
स्रोत
पाराशर के अध्याय महर्षि संस्करण के अनुसार हैं। दूसरे संस्करणों में नंबर बदल सकते हैं।
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 46, श्लोक 3, 12–16 (महर्षि संस्करण)
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 47, श्लोक 5 (महर्षि संस्करण)
- फलदीपिका, मंत्रेश्वर, अध्याय 19 (जन्म पर बची दशा का श्लोक 3 सहित)
- ज्योतिष रत्नाकर, पृष्ठ 125 (जन्म की दशा)
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 51, श्लोक 1–3 (महर्षि संस्करण)
- सारावली, कल्याणवर्मा, अध्याय 40 (श्लोक 19, 45–47 सहित)
दशासमाः क्रमादेषां षड् दशाऽश्वा गजेन्दवः / नृपाला नवचन्द्राश्च नगचन्द्रा नगा नखाः